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एक दूर पहाड़ी गाँव में, जहाँ रातें सितारों को निगल जाती थीं, कविता रहती थी। 40 साल की कविता एक बुनकर थी, जो अपने हाथों से धागों को कपड़ा बनाती थी। मगर उसका दिल एक भारी जिम्मेदारी ढोता था—एक पुरानी पीतल की लालटेन को जलाए रखना। यह लालटेन उसके दादाजी से मिली थी, जिसने तूफानों और अंधेरे में परिवार को रास्ता दिखाया था। एक सर्दी में, जब भूस्खलन ने गाँव को दुनिया से काट दिया, कविता ने लालटेन की चमक को अपने हाथों में डगमगाते देखा। यह सिर्फ रोशनी नहीं थी—यह उम्मीद थी, और उसे पता था कि इसे जलाए रखना है।
कविता के दादाजी गाँव के प्रकाशवाहक थे, जो पहाड़ी पर एक दीपक जलाते थे। उन्होंने उसे कहानियाँ सुनाई थीं कि कैसे लालटेन की चमक ने भटके यात्रियों को बचाया, इसकी स्थिर लौ सुरक्षा का वादा थी। उनके जाने के बाद, कविता को यह मिला, साथ में उनका धैर्य भी। मगर जिंदगी कठिन हो गई—उसका पति चला गया, करघे टूट गए, गाँव सिकुड़ गया। भूस्खलन ने रास्ता दबा दिया, और उसकी उम्मीद डगमगा गई। फिर भी, लालटेन की चमक एक विरासत की फुसफुसाहट थी जिसे वह मिटने नहीं दे सकती थी।
भूस्खलन के बाद की रात,
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दिन ठंडे हो गए, राशन कम पड़ा। गाँव वाले बड़बड़ाए, “रोशनी का क्या फायदा जब कोई नहीं आएगा?” उसकी बेटी, रानी, ने कहा, “चलें, माँ।” मगर कविता ने सिर हिलाया, उसका धैर्य गहरे जड़ा था। उसने टूटे मटकों से तेल जुटाया, लालटेन के फटे शीशे को जोड़ा, और हर शाम चढ़ी। लालटेन की चमक सिर्फ दूसरों के लिए नहीं थी—यह उसका सहारा थी, दादाजी की विरासत का सबूत।
हफ्ते बीते, और कुछ बदला। एक लड़के ने दूर की पहाड़ी से लालटेन की चमक देखी और अपने पिता, एक व्यापारी, को बताया। खबर फैली, और जल्द ही एक छोटा कारवाँ टूटे रास्तों से आया, चावल और कंबल लाया। गाँव में जान आई—बच्चे हँसे, बुजुर्ग मुस्कुराए। वे कविता की मदद को आए, ईंधन के लिए टहनियाँ लाए, खंभा ठीक किया। लालटेन की चमक उनका प्रदीप बन गई, एक साझा उम्मीद जो उन्हें निराशा से खींच लाई। कविता ने सिर्फ लौ नहीं जलाई—एक समुदाय को जगाया।
सर्दी लंबी हुई, कविता के धैर्य की परीक्षा लेती। तूफानों ने पहाड़ी को पीटा, और एक बार बारिश ने लालटेन की चमक को लगभग बुझा दिया। उसने अपनी शाल से इसे ढका, उसके हाथ कांपे मगर मजबूत रहे। हर रात वह चढ़ी, उसके पैर दुखे, मगर उसकी आत्मा मजबूत हुई। लालटेन की चमक परफेक्ट नहीं थी—यह टिमटिमाई, मंद हुई—मगर कभी बुझी नहीं। यह अब उसकी विरासत थी, एक रोशनी जो उसके साथ टिकी।
बसंत आया, और रास्ता साफ हुआ। गाँव फिर से फला, मगर लालटेन की चमक बनी रही। कविता ने रानी को इसे संभालना सिखाया, कहानियाँ और ताकत सौंपी जो इसे जलाए रखने में लगी। व्यापारी अब पहाड़ी को “लालटेन का विश्राम” कहते, एक ठिकाना जो उम्मीद से चिह्नित था। कविता के करघे फिर गूँजे, मगर उसका असली काम रोशनी थी—एक विरासत जो अंधेरे को मात देती थी। वह सिर्फ बुनकर नहीं थी; वह लालटेन की चमक की रखवाली थी।
लालटेन ने कविता को सिखाया कि उम्मीद शोर नहीं—निरंतरता है। धैर्य गिरने में नहीं, हर बार उठने में है। विरासत दी नहीं जाती—बनाई जाती है। उसने लालटेन का डेंटेड आधार शेल्फ पर रखा, उन रातों की याद जो इसने उसे रास्ता दिखाया। इसकी चमक ने गाँव को रोशन किया, मगर उसकी आत्मा को भी।
हम सब एक लालटेन ढोते हैं—एक रोशनी जो मुश्किल में टिमटिमाती है। कविता के लिए यह पीतल और लौ थी; आपके लिए यह लक्ष्य, याद, या शांत ताकत हो सकती है। लालटेन की चमक हमें इसे संभालने, धैर्य रखने, अंधेरे के खिलाफ एक विरासत बनाने को बुलाती है। यह एक रात से शुरू होता है, उम्मीद की एक चिंगारी से, अंधेरे के खिलाफ एक विद्रोह से। चमक आपकी है। क्या आप इसे चमकने देंगे?
आज, कविता की पहाड़ी रोशन है, लालटेन की चमक का सबूत जो उसने बुझने नहीं दी। उसकी कहानी आपकी है—एक याद कि सबसे गहरी रात में भी, छोटी रोशनी रास्ता दिखा सकती है।
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