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नदी का वादा

नदी का वादा

धारा की फुसफुसाहट

एक धूल भरे गाँव में, जो एक घुमावदार नदी के किनारे बसा था, प्रिया मिट्टी में हाथ डाले जीती थी। 35 साल की प्रिया एक किसान थी, जो सूखी जमीन से फसल उगाकर अपने परिवार का पेट भरती थी। नदी हमेशा उसकी जीवनरेखा रही—इसका पानी उसकी फसलों और आत्मा को सींचता था। मगर एक गर्मी में, नदी सूखने लगी, सिर्फ एक पतली धारा छोड़कर, और खेत टूट गए। फिर भी, प्रिया को नदी का वादा सुनाई दिया, जो सरकंडों के बीच से फुसफुसा रहा था, उसे थामे रहने को कह रहा था। यह उसका मौका था इस पर भरोसा करने का।

धूल के खेत

प्रिया की जिंदगी हमेशा नदी से नहीं बंधी थी। वह कभी शहर में पढ़ने का सपना देखती थी, उसकी कॉपियाँ पुलों और इमारतों के रेखाचित्रों से भरी थीं। मगर माँ के गुजरने के बाद, वह खेत संभालने रुक गई, उसके सपने मिट्टी में दब गए। अब, नदी के सूखने से गाँव वाले जाने की बात करते थे। “यह जमीन शापित है,” वे कहते। पर प्रिया को नदी का वादा अपनी हड्डियों में महसूस हुआ—एक पुकार कि जहाँ दूसरों को हार दिखती, वहाँ ताकत खोजे।

पहली बूंद

एक सुबह, प्रिया नदी के किनारे गई, उसके पैर सूखी जमीन पर

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चटक रहे थे। वह झुकी, बची हुई धारा को उंगलियों से छूती हुई। “तूने मुझे कभी नहीं छोड़ा,” उसने बुदबुदाया, विश्वास उसके सीने में जगा। उसने खोदना शुरू किया—छोटी नालियाँ जो बचा पानी पकड़ें, उसे खेतों तक ले जाएँ। पड़ोसियों ने हँसा, पर प्रिया लगी रही, उसके हाथ छाले से भरे, उसका दिल नदी के वादे पर टिका। कुछ दिन बाद, हल्की बारिश हुई, और उसकी नालियों ने पानी रोका—एक नाजुक शुरुआत।

सूखे का सामना

सूखा और सख्त हो गया। फसलें मुरझा गईं, गाँव बेचैन हो उठा। प्रिया का भाई, विक्रम, उसे जाने को कहता, “यहाँ ताकत नहीं बची।” मगर प्रिया ने अपने अंकुरों की ओर इशारा किया, भूरे में हरे। “नदी का वादा खत्म नहीं हुआ—यह इंतजार कर रहा है।” वह दूर के कुएँ से बाल्टियाँ ढोती, उसकी पीठ दुखती, उसका विश्वास अडिग। हर बूंद एक कदम था, उसकी यात्रा का सबूत।

समुदाय का पुनर्जन्म

प्रिया की जिद्दी उम्मीद फैल गई। एक पड़ोसी साथ आया, फिर दूसरा। जल्द ही, दर्जनों हाथ खोद रहे थे, उसकी नालियों को खेतों में जाल बना दिया। बच्चे कंकड़ लाए, हँसते हुए उन्हें बिछाते। नदी का वादा अब सिर्फ उसका नहीं था—यह सबका हो गया। जब तेज बारिश आई, नालियाँ भर गईं, और गाँव ने खुशी से चीखा। प्रिया ने एक नया जन्म शुरू किया, यह साबित करते हुए कि विश्वास से ताकत फूट सकती है।

ज्वार का बदलाव

महीनों बाद, नदी हिली। जो धारा थी, वह स्थिर प्रवाह बन गई, इसके किनारे हरे हो गए। प्रिया के खेत लहलहाए—सुनहरा गेहूँ जहाँ धूल थी। उसकी यात्रा आसान नहीं थी; उसने ताने सुने, थकान जानी, शक झेले। मगर नदी का वादा सच हुआ, इसलिए नहीं कि वह कभी डगमगाई नहीं, बल्कि इसलिए कि उसने इसके लिए लड़ाई की। वह अब मजबूत खड़ी थी, एक किसान जिसने फुसफुसाहट को गर्जन बनाया।

नया प्रवाह

गाँव नदी के साथ बदल गया। प्रिया ने दूसरों को सिखाया—पानी कैसे मोड़ा जाए, जमीन पर कैसे भरोसा किया जाए। उसने नदी पर एक छोटा पुल बनाया, अपने पुराने रेखाचित्रों को श्रद्धांजलि, और उसे “आशा” नाम दिया। नदी का वादा उसमें बहता था, एक भविष्य गढ़ता जहाँ उसका परिवार फला। वह सिर्फ किसान नहीं थी—वह विश्वास की रखवाली थी, एक यात्रा की अगुवा जिसने सबको बचाया।

किनारों के सबक

नदी ने प्रिया को सिखाया कि ताकत शोर नहीं—स्थिरता है। विश्वास अंधा नहीं—यह कर्म से बनता है। और यात्रा आसान नहीं होती। उसने नदी के किनारे का एक कंकड़ दरवाजे पर रखा, उस वादे की याद जो उसने थामा। नदी ने सिर्फ फसलें नहीं सींचीं—उसकी आत्मा को भी भिगोया।

आपकी नदी, आपका वादा

हम सबके सामने एक सूखती नदी आती है—वह वक्त जब जिंदगी का प्रवाह धीमा पड़ता है। प्रिया के लिए यह जमीन थी; आपके लिए यह संघर्ष, हानि, या मुरझाता सपना हो सकता है। नदी का वादा हम सबको बुलाता है, खोदने, विश्वास करने, आगे बढ़ने को। यह एक नाली से शुरू होता है, ताकत का एक कदम, विश्वास की एक चिंगारी। यात्रा आपको गढ़ती है, और वादा तब तक रहता है जब तक आप उसे थामते हैं। तो, अपनी नदी सुनें। आप उसकी फुसफुसाहट से क्या बनाएंगे?

आज, प्रिया का गाँव जीवन से गूँजता है, नदी के वादे का सबूत। उसकी कहानी आपकी है—एक याद कि सूखे में भी, एक धारा बहने को तैयार है।

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