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पहाड़ की गूंज

पहाड़ की गूंज

शांत पुकार

हिमालय की तलहटी में बसे एक छोटे गाँव में, आरव एक साधारण जीवन जीता था। 28 साल का आरव एक चरवाहा था, जो अपनी भेड़ों को विशाल आकाश के नीचे चराता था। लेकिन हर शाम, जब सूरज पहाड़ों के पीछे डूबता, उसे एक फुसफुसाहट सुनाई देती—पहाड़ की गूंज। यह हवा या चिड़ियों की आवाज नहीं थी; यह कुछ गहरा था, जो उसे बुला रहा था कि वह चढ़े, पहाड़ की गूंज को खोजे, जो एक चरवाहे के जीवन से बढ़कर कुछ वादा करती थी। यह मौका था उस पुकार का जवाब देने का।

बर्फ में दबे सपने

आरव हमेशा चरवाहा नहीं था। बचपन में, उसने पहाड़ों को जीतने का सपना देखा था, पर्वतारोहियों की कहानियों से प्रेरित होकर। वह कागज के टुकड़ों पर नक्शे बनाता, शिखर से दिखने वाले नजारे की कल्पना करता। लेकिन जिंदगी ने दूसरा रास्ता चुना—उसके पिता बीमार पड़ गए, और आरव ने परिवार की भेड़ों को संभाला। सपने दब गए, सालों की दिनचर्या में खो गए। फिर भी, पहाड़ की गूंज कभी बंद नहीं हुई, उसे उस हिम्मत की याद दिलाती जो कभी उसके पास थी।

पहली चढ़ाई

एक ठंडी सुबह, आरव ने फैसला किया। उसने अपनी भेड़ें छोटे भाई को सौंपीं और एक छोटा थैला तैयार किया—रस्सी, पुरानी

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जैकेट, और मुट्ठी भर सूखे मेवे। गाँव के बुजुर्गों ने चेताया, “पहाड़ सपने देखने वालों को माफ नहीं करता।” मगर आरव को पहाड़ की गूंज पहले से कहीं तेज सुनाई दी। पथरीले रास्ते पर हर कदम के साथ उसके पैर कांपे, ठंड से नहीं, बल्कि पुराने जीवन को पीछे छोड़ने के बोझ से। यह चढ़ाई सिर्फ शिखर तक पहुंचने की नहीं थी—यह खुद को खोजने की थी।

तूफान का सामना

पहाड़ ने आरव की हिम्मत की परीक्षा जल्दी ली। एक अचानक बर्फीला तूफान आया, जो उसे सफेद क्रोध से अंधा कर गया। वह एक चट्टान से लटक गया, हवा भेड़िए की तरह चीख रही थी। शक ने घेर लिया—शायद बुजुर्ग सही थे। लेकिन तभी उसे फिर सुनाई दी: पहाड़ की गूंज, धीमी मगर स्थिर, उसे आगे बढ़ने को कहती। लगन से, उसने तूफान को पार किया, एक उथली गुफा में शरण ली। वहाँ उसने आराम किया, उसकी साँसें हवा में धुंध बनातीं, यह जानते हुए कि हर कठिनाई उसे सपनों के करीब ले जा रही थी।

गाँव का साथ

दिन हफ्तों में बदल गए। आरव की चढ़ाई गाँव में कहानी बन गई। कुछ ने उसे बेकार कहा, पर कुछ ने उसमें आशा देखी। जब वह आपूर्ति के लिए लौटा, बच्चे उसके पीछे दौड़े, पहाड़ की गूंज के बारे में पूछते हुए। एक बढ़ई ने उसे मजबूत छड़ी दी; एक बूढ़ी औरत ने ऊनी मफलर थमाया। उनके विश्वास ने आरव की हिम्मत बढ़ाई। वह अब अकेला नहीं चढ़ रहा था—गाँव उसके साथ चढ़ रहा था, उनके सपने उसकी गूंज बन गए।

भीतर का शिखर

आखिरी चढ़ाई क्रूर थी। बर्फ ने चट्टानों को ढक दिया, हवा हर कदम के साथ पतली होती गई। आरव के हाथ खून से लथपथ थे, शरीर दर्द से चीख रहा था, मगर उसकी आत्मा जल रही थी। आखिरकार, वह शिखर पर पहुँचा—एक विशाल, शांत मैदान जहाँ दुनिया नीचे फैली थी। पहाड़ की गूंज सिर्फ आवाज नहीं थी; यह हिम्मत थी जो उसने पाई, लगन थी जो उसने बनाई। वहाँ खड़े होकर, उसे एहसास हुआ कि शिखर अंत नहीं—एक शुरुआत था, उसकी क्षमता का सबूत।

नया क्षितिज

आरव गाँव लौटा, एक बदला हुआ इंसान। पहाड़ ने उसे नया रूप दिया, और वह इसके सबक घर लाया। उसने बच्चों को चढ़ना सिखाना शुरू किया, नक्शे और पहाड़ की गूंज की कहानियाँ साझा कीं। उसकी भेड़ें अभी भी चरती थीं, पर अब वह ट्रेक की अगुवाई करता, दूसरों को वह पुकार सुनाता। गाँव फला-फूला, अब सिर्फ पहाड़ की तलहटी का बिंदु नहीं, बल्कि सपने देखने वालों का ठिकाना। आरव ने पहाड़ की गूंज का जवाब दिया, और ऐसा करके, सबको ऊपर उठाया।

ऊँचाइयों के सबक

पहाड़ ने आरव को सिखाया कि सपने मरते नहीं—इंतजार करते हैं। हिम्मत डर की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि उसके पार जाने का फैसला है। लगन फुसफुसाहट को गर्जना में बदल देती है। पहाड़ की गूंज उसका मार्गदर्शक थी, पर ताकत उसकी अपनी थी। उसने शिखर का एक पत्थर जेब में रखा, याद दिलाने के लिए कि हर कदम कीमती था।

आपका पहाड़, आपकी गूंज

हम सबके पास एक पहाड़ है—एक चुनौती जो बड़ी लगती है, जो हमारा नाम पुकारती है। आरव के लिए यह शिखर था; आपके लिए यह करियर, जुनून, या डर हो सकता है। पहाड़ की गूंज हम सबको बुलाती है, हमें चढ़ने की चुनौती देती है। यह एक कदम से शुरू होता है, हिम्मत का एक कदम, लगन का एक दिन। शिखर लक्ष्य नहीं—यह वह इंसान है जो आप रास्ते में बनते हैं। तो, ध्यान से सुनें। आपकी गूंज इंतजार कर रही है। क्या आप जवाब देंगे?

आज, आरव का गाँव जीवन से भरा है—यह सबूत कि पहाड़ की गूंज का पीछा करने से क्या होता है। उसकी कहानी आपकी भी है—एक याद कि कोई शिखर उससे ऊँचा नहीं जो आप चढ़ने की हिम्मत करें।

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